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Bhariya sambhidan ke vikas par sanshipt itihas

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Topic 1: पृष्ठ 1: संवैधानिक विकास की पृष्ठभूमि (1600-1773)

भारतीय संविधान का विकास ब्रिटिश शासन के दो मुख्य चरणों में हुआ: 1. कंपनी का शासन (1773–1858) 2. ताज (क्राउन) का शासन (1858–1947) गोल्डन पॉइंट्स: * 1600: ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (चार्टर द्वारा व्यापारिक अधिकार)। * 1765: कंपनी ने बंगाल, बिहार और ओडिशा के दीवानी अधिकार प्राप्त किए (इलाहाबाद की संधि)। * इस दोहरी व्यवस्था (दीवानी + निजामत) के कारण कंपनी के अधिकारियों में भ्रष्टाचार बढ़ा और प्रशासन चरमरा गया। कंपनी शासन के पहले कदम की आवश्यकता: * कंपनी के कार्यों को नियंत्रित और विनियमित करना। * राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यों को मान्यता देना। * भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखना। उदाहरण: दीवानी अधिकार मिलने के बाद, कंपनी ने राजस्व संग्रह किया लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं ली, जिससे बंगाल में भयानक अकाल पड़ा।

Topic 2: पृष्ठ 2: रेगुलेटिंग एक्ट, 1773: केंद्रीयकरण की शुरुआत

यह कंपनी के मामलों को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा उठाया गया पहला कदम था। मुख्य प्रावधान: * पद परिवर्तन: बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर जनरल' बना दिया गया। (प्रथम: लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स)। * कार्यकारी परिषद: गवर्नर जनरल की सहायता के लिए 4 सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया। * अधीनता: बम्बई और मद्रास के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया, जिससे केंद्रीयकरण शुरू हुआ। * सर्वोच्च न्यायालय: 1774 में कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई (एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश)। आलोचना: यह एक्ट अपूर्ण था क्योंकि इसमें गवर्नर जनरल और सर्वोच्च न्यायालय के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन नहीं किया गया था।

Topic 3: पृष्ठ 3: पिट्स इंडिया एक्ट, 1784: दोहरी सरकार का जन्म

रेगुलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए पारित किया गया। इसे 'एक्ट ऑफ सेटलमेंट' भी कहते हैं। प्रमुख विशेषताएं: * राजनीतिक/वाणिज्यिक पृथक्करण: कंपनी के कार्यों को दो भागों में विभाजित कर दिया गया। * दोहरी सरकार (Double Government) की शुरुआत: * कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (Court of Directors): वाणिज्यिक (व्यापार) मामलों का प्रबंधन। * बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control
  • BOC): राजनीतिक (सैनिक, सिविल और राजस्व) मामलों के प्रबंधन के लिए नया निकाय।
  • * स्वर्ण बिंदु: BOC को भारत में 'सिविल और सैन्य सरकार या राजस्व' से संबंधित सभी कार्यों का अधीक्षण और नियंत्रण करने की शक्ति दी गई। महत्व: भारत में कंपनी के कब्जे वाले क्षेत्र को पहली बार 'ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र में भारत' कहा गया।

    Topic 4: पृष्ठ 4: चार्टर अधिनियम, 1793 और 1813

    चार्टर अधिनियम, 1793: * गवर्नर जनरल को बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसियों पर अधिक अधिकार दिए गए। * BOC के सदस्यों को अब भारतीय राजस्व से भुगतान किया जाना था (यह प्रथा 1919 तक चली)। * यह अधिनियम कंपनी के व्यापार एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाता है। चार्टर अधिनियम, 1813: * कंपनी के एकाधिकार की समाप्ति: चीन के साथ व्यापार और चाय के व्यापार को छोड़कर, कंपनी का भारत में व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया। * ईसाई मिशनरी: ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुमति दी गई। * शिक्षा: भारतीयों की शिक्षा के लिए प्रति वर्ष एक लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया। उदाहरण: 1813 के बाद, व्यापार में निजी ब्रिटिश व्यापारियों की भागीदारी बढ़ गई।

    Topic 5: पृष्ठ 5: चार्टर अधिनियम, 1833: पूर्ण केंद्रीयकरण

    यह ब्रिटिश भारत में केंद्रीयकरण की दिशा में अंतिम कदम था। प्रमुख प्रावधान: * केंद्रीयकरण का शिखर: बंगाल के गवर्नर जनरल को 'भारत का गवर्नर जनरल' बना दिया गया। (प्रथम: लॉर्ड विलियम बेंटिक)। उन्हें सभी सिविल और सैन्य शक्तियाँ दी गईं। * विधि आयोग: भारत में कानूनों के संहिताकरण (Codification) के लिए एक विधि आयोग (Law Commission) नियुक्त किया गया (प्रथम अध्यक्ष: लॉर्ड मैकाले)। * कानूनी सदस्य: गवर्नर जनरल की परिषद में विधि सदस्य (लॉर्ड मैकाले) को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया गया। * ईस्ट इंडिया कंपनी: कंपनी के व्यापारिक निकाय के रूप में सभी कार्य समाप्त कर दिए गए। यह अब विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक निकाय बन गई। स्वर्ण बिंदु: इस अधिनियम ने सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता की शुरुआत करने का प्रयास किया, लेकिन कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

    Topic 6: पृष्ठ 6: चार्टर अधिनियम, 1853: विधायी पृथक्करण

    चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला में यह अंतिम था। इसने संवैधानिक इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रमुख विशेषताएं: * विधायी और कार्यकारी कार्यों का पृथक्करण: पहली बार गवर्नर जनरल की परिषद के विधायी (कानून बनाने) और कार्यकारी (लागू करने) कार्यों को अलग किया गया। * विधान परिषद: कानून बनाने के उद्देश्य से 'भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद' (Indian Legislative Council) नामक एक नई 6 सदस्यीय परिषद का गठन किया गया, जो एक छोटी संसद की तरह काम करती थी। * सिविल सेवा: 1833 के विफल प्रयास के बाद, अब खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सिविल सेवकों की भर्ती शुरू हुई। (मैकाले समिति, 1854). * कंपनी शासन का अंत नहीं: कंपनी को भारतीय क्षेत्रों को ब्रिटिश ताज के विश्वास में रखने की अनुमति दी गई, लेकिन कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई (जो कंपनी शासन के आसन्न अंत का संकेत था)।

    Topic 7: पृष्ठ 7: 1857 का विद्रोह और ताज के शासन की शुरुआत

    1857 के विद्रोह ने भारत में कंपनी के कुप्रशासन को उजागर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने सीधे नियंत्रण लेने का निर्णय लिया। गोल्डन पॉइंट्स: * विद्रोह को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में भी जाना जाता है। * इसने कंपनी के राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण पर गंभीर सवाल उठाए। * विद्रोह के बाद, ब्रिटेन की संसद ने भारत के शासन को सीधे अपने हाथों में लेने के लिए 1858 का अधिनियम पारित किया। ताज (क्राउन) शासन के उद्देश्य: * बेहतर प्रशासन के लिए भारत की सरकार को विनियमित करना। * कंपनी के निदेशकों और नियंत्रकों की शक्तियों को समाप्त करना। उदाहरण: कंपनी द्वारा किए गए खराब भूमि राजस्व निपटान (जैसे स्थायी बंदोबस्त) और अवध जैसे राज्यों के विलय ने व्यापक असंतोष पैदा किया, जो 1857 के विद्रोह का मुख्य कारण बना।

    Topic 8: पृष्ठ 8: भारत सरकार अधिनियम, 1858: कंपनी शासन का अंत

    इसे 'भारत के बेहतर शासन के लिए अधिनियम' (An Act for the Better Government of India) भी कहा जाता है। प्रमुख विशेषताएं: * क्राउन का शासन: ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया गया और शक्तियाँ सीधे ब्रिटिश ताज को हस्तांतरित कर दी गईं। * पद परिवर्तन: गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर 'भारत का वायसराय' कर दिया गया। (प्रथम: लॉर्ड कैनिंग)। वायसराय सीधे क्राउन का प्रतिनिधि था। * दोहरी सरकार की समाप्ति: पिट्स इंडिया एक्ट (1784) द्वारा शुरू की गई बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स की प्रणाली समाप्त कर दी गई। * भारत राज्य सचिव: ब्रिटेन में एक नया पद, 'भारत के राज्य सचिव' (Secretary of State for India), सृजित किया गया। यह ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था और भारत के प्रशासन पर अंतिम नियंत्रण रखता था। महत्व: इसने भारत में संवैधानिक इतिहास के एक नए चरण की शुरुआत की।

    Topic 9: पृष्ठ 9: भारतीय परिषद अधिनियम, 1861: प्रतिनिधित्व की शुरुआत

    यह अधिनियम भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने का पहला संकेत था, हालांकि सीमित रूप में। मुख्य प्रावधान: * गैर-सरकारी सदस्यों का समावेशन: वायसराय की विधान परिषद में भारतीयों को गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में नामांकित करने की शुरुआत हुई। * उदाहरण: 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों
  • बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव - को नामित किया।
  • * विकेंद्रीकरण: मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसी को उनकी विधायी शक्तियाँ बहाल कर दी गईं। इसने विधायी विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की। * नई विधान परिषदों की स्थापना: बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) और पंजाब में नई विधान परिषदें स्थापित करने की शक्ति दी गई। * अध्यादेश की शक्ति: वायसराय को विधान परिषद की सहमति के बिना अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति दी गई (आपातकाल के दौरान)।

    Topic 10: पृष्ठ 10: भारतीय परिषद अधिनियम, 1892

    यह अधिनियम विधान परिषदों में भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाकर प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में एक और कदम था। मुख्य विशेषताएं: * विधायी कार्य में वृद्धि: केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के कार्यों में वृद्धि की गई। सदस्यों को बजट पर चर्चा करने और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई। * चुनाव का बीज: हालांकि प्रत्यक्ष चुनाव शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था, लेकिन इसने परिषदों में कुछ गैर-सरकारी सदस्यों को अप्रत्यक्ष रूप से नियुक्त करने के लिए एक प्रावधान पेश किया। * केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की सिफारिश प्रांतीय विधान परिषदों और बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा की जाती थी। * गोल्डन पॉइंट: यह अधिनियम भारतीय विधान परिषदों के लिए एक सीमित और अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली (Electoral System) की शुरुआत करने वाला पहला कानून था। महत्व: इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885 में स्थापित) की बढ़ती मांगों को कुछ हद तक शांत करने का प्रयास किया।

    Topic 11: पृष्ठ 11: भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 (मॉर्ले-मिंटो सुधार)

    इस अधिनियम को 'मॉर्ले-मिंटो सुधार' के नाम से जाना जाता है (लॉर्ड मॉर्ले: भारत सचिव, लॉर्ड मिंटो: वायसराय)। प्रमुख प्रावधान: * परिषद का आकार: केंद्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई। प्रांतीय परिषदों का आकार भी बढ़ाया गया। * निर्वाचन मंडल: पहली बार प्रत्यक्ष रूप से सीमित चुनाव की व्यवस्था की गई। * सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation): मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली की शुरुआत की गई। * मुस्लिम सदस्य केवल मुस्लिम मतदाताओं द्वारा ही चुने जाते थे। * स्वर्ण बिंदु: लॉर्ड मिंटो को 'सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक' के रूप में जाना जाता है। कार्यकारी परिषद में भारतीय सदस्य: पहली बार किसी भारतीय को वायसराय की कार्यकारी परिषद में शामिल किया गया। (सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा – विधि सदस्य)।

    Topic 12: पृष्ठ 12: मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) का विश्लेषण

    मॉर्ले-मिंटो सुधार की आलोचना: * सांप्रदायिकता का बीजारोपण: इस अधिनियम ने भारत में सांप्रदायिकता को कानूनी मान्यता दी, जिसने देश के विभाजन की नींव रखी। * सीमित शक्तियाँ: यद्यपि सदस्यों को बजट पर संकल्प प्रस्तावित करने और पूरक प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई, लेकिन वे केवल सलाहकारी थे, न कि निर्णयात्मक। * वास्तविक प्रतिनिधित्व का अभाव: चुनाव प्रणाली बहुत सीमित थी और धन या संपत्ति पर आधारित थी, इसलिए आम जनता को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। स्वर्ण बिंदु: * वायसराय मॉर्ले ने स्पष्ट रूप से कहा था कि इसका उद्देश्य भारत में जिम्मेदार सरकार (Responsible Government) स्थापित करना नहीं है। * यह अधिनियम उदारवादियों को खुश करने और क्रांतिकारियों को दबाने के लिए एक ब्रिटिश रणनीति थी। उदाहरण: इस अधिनियम के तहत, एक मुस्लिम उम्मीदवार को जिताने के लिए हिंदू वोट की कोई आवश्यकता नहीं थी, जिसने राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया।

    Topic 13: पृष्ठ 13: मोंटेग्यू घोषणा (1917) और पृष्ठभूमि

    प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) का प्रभाव: * युद्ध में भारतीय समर्थन प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ा। * भारत में होम रूल आंदोलन (एनी बेसेंट और तिलक) ने राजनीतिक मांगों को तेज कर दिया। मोंटेग्यू घोषणा (20 अगस्त, 1917): * भारत के तत्कालीन सचिव, एडविन मोंटेग्यू ने घोषणा की कि ब्रिटिश नीति का उद्देश्य भारत में प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों को शामिल करना और क्रमशः जिम्मेदार सरकार की स्थापना करना है, जो ब्रिटिश साम्राज्य का अभिन्न अंग हो। गोल्डन पॉइंट: 1917 की यह घोषणा ब्रिटिश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव थी, क्योंकि पहली बार 'जिम्मेदार सरकार' शब्द का इस्तेमाल किया गया था, जो 1909 के अधिनियम के विपरीत था। परिणाम: इस घोषणा के आधार पर 1919 का भारत सरकार अधिनियम तैयार किया गया।

    Topic 14: पृष्ठ 14: भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार)

    इस अधिनियम को 'मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार' कहा जाता है। इसे 1921 में लागू किया गया। मुख्य विशेषताएं: * द्वैध शासन (Diarchy) का परिचय: प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभाजित किया गया: 1. हस्तांतरित विषय (Transferred Subjects): गवर्नर द्वारा भारतीय मंत्रियों की सहायता से प्रशासित (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य)। 2. आरक्षित विषय (Reserved Subjects): गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद द्वारा प्रशासित (जैसे वित्त, पुलिस)। * द्विसदनीयता (Bicameralism): केंद्रीय विधानमंडल में पहली बार द्विसदनीय व्यवस्था शुरू की गई। * उच्च सदन: राज्य परिषद (Council of State) * निम्न सदन: केंद्रीय विधान सभा (Central Legislative Assembly) * प्रत्यक्ष चुनाव: देश में पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत हुई। * सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार: सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियंस और यूरोपियनों तक बढ़ाया गया।

    Topic 15: पृष्ठ 15: 1919 अधिनियम की आलोचना और महत्वपूर्ण बिंदु

    द्वैध शासन की विफलता: * मंत्रियों के पास हस्तांतरित विषयों पर नियंत्रण तो था, लेकिन वित्त और नौकरशाही पर उनका नियंत्रण नहीं था (क्योंकि ये आरक्षित थे)। * मंत्रियों और गवर्नर के बीच अक्सर असहमति होती थी, जिससे प्रशासन में गतिरोध आता था। स्वर्ण बिंदु: * इस अधिनियम ने भारत में एक लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की स्थापना का प्रावधान किया। (1926 में ली आयोग की सिफारिश पर केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई)। * यह अधिनियम वैधानिक आयोग (Statutory Commission) की स्थापना के लिए भी प्रावधान करता था, जिसे 10 वर्षों बाद अधिनियम के कामकाज की जांच करनी थी (जिसके परिणामस्वरूप साइमन कमीशन आया)। भारत सचिव का कार्यभार: भारत सचिव (Secretary of State) को भारतीय राजस्व से वेतन देने की प्रथा समाप्त कर दी गई।

    Topic 16: पृष्ठ 16: साइमन कमीशन, 1927

    भारत सरकार अधिनियम 1919 के कामकाज की जांच करने और भारत के लिए आगे संवैधानिक सुधारों का सुझाव देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने समय से 2 साल पहले (1927 में) कमीशन की नियुक्ति की। मुख्य विशेषताएं: * अध्यक्ष: सर जॉन साइमन। * सदस्यता: आयोग में सभी 7 सदस्य ब्रिटिश थे। किसी भी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया। * विरोध: भारतीयों ने इसका जोरदार विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि उनके संवैधानिक भविष्य पर निर्णय लेने में उनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई। साइमन कमीशन की सिफारिशें (1930): * द्वैध शासन को समाप्त करना और प्रांतों में जिम्मेदार सरकार स्थापित करना। * केंद्र में संघीय ढांचे का गठन करना। * सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखना। परिणाम: इन सिफारिशों पर चर्चा के लिए गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए।

    Topic 17: पृष्ठ 17: नेहरू रिपोर्ट, 1928: भारतीय प्रयास

    साइमन कमीशन का विरोध करने के दौरान, भारत सचिव लॉर्ड बर्केनहेड ने भारतीयों को चुनौती दी कि वे एक ऐसा संविधान तैयार करें जिस पर सभी राजनीतिक दल सहमत हों। नेहरू रिपोर्ट का गठन: * अध्यक्ष: मोतीलाल नेहरू (अखिल पार्टी सम्मेलन द्वारा गठित समिति के)। * यह भारतीयों द्वारा संविधान का मसौदा तैयार करने का पहला बड़ा प्रयास था। रिपोर्ट की प्रमुख मांगें: * डोमिनियन स्टेटस (Dominion Status): भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर अधिराज्य का दर्जा दिया जाए। * संयुक्त निर्वाचन मंडल: सांप्रदायिक निर्वाचन मंडल को समाप्त करके संयुक्त निर्वाचन मंडल स्थापित किया जाए। * मौलिक अधिकार: रिपोर्ट में 19 मौलिक अधिकारों की मांग की गई। * केंद्र में द्विसदनीय विधानमंडल की स्थापना। गोल्डन पॉइंट: मुस्लिम लीग ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया, जिससे भारतीय संविधान निर्माण पर एकता की कमी उजागर हुई।

    Topic 18: पृष्ठ 18: गोलमेज सम्मेलन (1930-1932)

    भारतीय संवैधानिक सुधारों पर चर्चा करने के लिए ब्रिटिश सरकार और भारतीय राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन लंदन में किया गया। प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930): * कांग्रेस ने बहिष्कार किया। * परिणाम: कोई ठोस निष्कर्ष नहीं। द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931): * गांधी-इरविन समझौते के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने भाग लिया (प्रतिनिधि: महात्मा गांधी)। * सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गतिरोध के कारण यह भी असफल रहा। तृतीय गोलमेज सम्मेलन (1932): * बहुत कम प्रतिनिधि शामिल हुए। कांग्रेस ने फिर से भाग नहीं लिया। स्वर्ण बिंदु: डॉ. बी.आर. अम्बेडकर एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। सम्मेलनों में हुई चर्चाओं के आधार पर श्वेत पत्र तैयार किया गया, जो 1935 के अधिनियम का आधार बना।

    Topic 19: पृष्ठ 19: भारत सरकार अधिनियम, 1935 (भाग I)

    यह अधिनियम भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था (संविधान का लगभग दो-तिहाई हिस्सा 1935 के अधिनियम से लिया गया है)। प्रमुख विशेषताएं: * अखिल भारतीय संघ: इसने अखिल भारतीय संघ (All India Federation) की स्थापना का प्रावधान किया, जिसमें प्रांत और रियासतें शामिल होनी थीं। (हालांकि, रियासतों के शामिल न होने के कारण यह प्रावधान कभी लागू नहीं हुआ)। * शक्तियों का विभाजन: केंद्र और इकाइयों के बीच शक्तियों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया: 1. संघीय सूची (Federal List) – केंद्र के लिए। 2. प्रांतीय सूची (Provincial List) – प्रांतों के लिए। 3. समवर्ती सूची (Concurrent List) – दोनों के लिए। * अवशिष्ट शक्तियाँ: वायसराय को दी गईं।

    Topic 20: पृष्ठ 20: भारत सरकार अधिनियम, 1935 (भाग II)

    1935 का अधिनियम व्यापक और विस्तृत था (321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ)। प्रांतीय स्वायत्तता: प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर दिया गया और उन्हें प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) दी गई। प्रांतों को अपने क्षेत्र में प्रशासन के लिए स्वायत्त इकाइयाँ घोषित किया गया। केंद्र में द्वैध शासन: प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त होने के बाद, केंद्र में द्वैध शासन की शुरुआत की गई। अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान: * संघीय न्यायालय: 1937 में दिल्ली में एक संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना की गई (जो सर्वोच्च न्यायालय नहीं था, क्योंकि अपील प्रिवी काउंसिल, लंदन में की जा सकती थी)। * द्विसदनीयता: छह प्रांतों (असम, बंगाल, बंबई, बिहार, मद्रास और संयुक्त प्रांत) में द्विसदनीय विधानमंडल की शुरुआत की गई। गोल्डन पॉइंट: इसने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना का भी प्रावधान किया।

    Topic 21: पृष्ठ 21: 1935 अधिनियम के स्वर्ण बिंदु और महत्व

    महत्व: * संवैधानिक ब्लूप्रिंट: यह भारत के भविष्य के संविधान का एक विस्तृत ब्लूप्रिंट था। * लोकतंत्र की नींव: प्रांतीय स्वायत्तता ने भारतीयों को सरकार चलाने का अनुभव दिया। 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकार बनाई। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार: इसे दलित वर्गों (अनुसूचित जातियों), महिलाओं और श्रमिकों (श्रम वर्ग) तक बढ़ाया गया (हालांकि यह पूना पैक्ट, 1932 के बाद हुआ, जो 1935 के अधिनियम में शामिल किया गया)। आलोचना: भारतीय नेताओं द्वारा इसे अस्वीकार कर दिया गया क्योंकि इसमें प्रस्तावना का अभाव था और वायसराय को अत्यधिक वीटो शक्तियाँ प्राप्त थीं। * जवाहरलाल नेहरू ने इसे 'ब्रेक रहित इंजन' (A engine with no brakes) कहा। उदाहरण: संघीय रेलवे प्राधिकरण (Federal Railway Authority) का गठन किया गया जो वायसराय के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था।

    Topic 22: पृष्ठ 22: अगस्त प्रस्ताव (1940) और क्रिप्स मिशन (1942)

    द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) का प्रभाव: युद्ध में भारतीय समर्थन प्राप्त करने के लिए संवैधानिक गतिरोध को तोड़ने के प्रयास किए गए। अगस्त प्रस्ताव, 1940 (वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो): * प्रमुख मांग: भारत को युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस दिया जाएगा। * भारतीयों को शामिल करके वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार किया जाएगा। * एक संविधान सभा का गठन होगा (परन्तु केवल मुख्य रूप से भारतीय)। * कांग्रेस और लीग द्वारा अस्वीकृत (कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस को अस्वीकार कर दिया)। क्रिप्स मिशन, 1942 (सर स्टैफोर्ड क्रिप्स): * मांग: युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया जाएगा। * संविधान सभा के गठन का स्पष्ट आश्वासन, जिसके सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं और रियासतों द्वारा चुने जाएंगे। * अस्वीकृति: गांधी ने इसे 'पोस्ट-डेटेड चेक' (Post-Dated Cheque) कहा, क्योंकि ब्रिटिशों के युद्ध हारने पर ये वादे निरर्थक हो जाते।

    Topic 23: पृष्ठ 23: कैबिनेट मिशन योजना, 1946: संविधान सभा का आधार

    द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए एक कैबिनेट मिशन भेजा। सदस्य: लॉर्ड पैथिक लॉरेंस (अध्यक्ष), सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर। मुख्य सिफारिशें: * पाकिस्तान की मांग अस्वीकार: इसने स्पष्ट रूप से मुस्लिम लीग की अलग पाकिस्तान की मांग को खारिज कर दिया। * संविधान सभा का गठन: संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन किया जाएगा। * सीटों का आवंटन: कुल 389 सीटें आवंटित की गईं, जो जनसंख्या के अनुपात में थीं (लगभग 10 लाख लोगों पर 1 सीट)। * सामूहिक समूह (Grouping): प्रांतों को तीन समूहों (A, B, C) में बांटा गया था। गोल्डन पॉइंट: कैबिनेट मिशन योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लिया, जिससे संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

    Topic 24: पृष्ठ 24: संविधान सभा का गठन और पहला सत्र

    सीटों का वितरण (389): * ब्रिटिश भारत: 296 सीटें (प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित)। * रियासतें: 93 सीटें (शासकों द्वारा नामांकित)। चुनाव परिणाम (जुलाई-अगस्त 1946): * भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 208 सीटें। * मुस्लिम लीग: 73 सीटें। * अन्य/छोटे समूह: 15 सीटें। संविधान सभा की पहली बैठक: 9 दिसंबर, 1946 को आयोजित की गई। मुस्लिम लीग ने इसका बहिष्कार किया। अस्थायी अध्यक्ष: फ्रांस की प्रथा के अनुसार, सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष चुना गया। स्थायी अध्यक्ष: 11 दिसंबर, 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया।

    Topic 25: पृष्ठ 25: संविधान सभा की कार्यप्रणाली

    उद्देश्य संकल्प (Objectives Resolution): * 13 दिसंबर, 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा ऐतिहासिक उद्देश्य संकल्प पेश किया गया। * यह संकल्प संविधान के मूल दर्शन और अंतर्निहित सिद्धांतों को निर्धारित करता है, जैसे संप्रभु, गणराज्य और न्याय। * 22 जनवरी, 1947 को सर्वसम्मति से इसे अपनाया गया। (यह संकल्प बाद में संविधान की प्रस्तावना बना)। स्वतंत्रता अधिनियम के बाद परिवर्तन (1947): * संविधान सभा को संप्रभु निकाय बनाया गया, जो ब्रिटिश संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को रद्द कर सकती थी। * संविधान सभा को दोहरी भूमिका दी गई: 1. संविधान बनाना। 2. देश के लिए साधारण कानून बनाना (विधायी निकाय)। * जब सभा विधायी निकाय के रूप में मिलती थी, तो इसकी अध्यक्षता जी.वी. मावलंकर करते थे।

    Topic 26: पृष्ठ 26: अंतरिम सरकार और विभाजन की ओर

    अंतरिम सरकार का गठन (सितंबर 1946): * कैबिनेट मिशन योजना के तहत वायसराय की कार्यकारी परिषद के स्थान पर अंतरिम सरकार बनाई गई। * पंडित जवाहरलाल नेहरू: परिषद के उपाध्यक्ष (प्रधानमंत्री के समान)। * लॉर्ड माउंटबेटन: प्रमुख (वायसराय)। * मुस्लिम लीग शुरू में शामिल नहीं हुई, लेकिन बाद में अक्टूबर 1946 में शामिल हुई। माउंटबेटन योजना (3 जून, 1947): * कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गंभीर मतभेदों के कारण, विभाजन अपरिहार्य हो गया। * इस योजना में भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का प्रावधान था। * इसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। गोल्डन पॉइंट: इस योजना को 'जून 3 योजना' भी कहा जाता है। इसने ब्रिटिश संसद से भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

    Topic 27: पृष्ठ 27: भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947

    यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सबसे महत्वपूर्ण कानून था, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया। मुख्य प्रावधान: * दो स्वतंत्र डोमिनियन: 15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र और संप्रभु डोमिनियनों की स्थापना। * वायसराय पद की समाप्ति: वायसराय का पद समाप्त कर दिया गया। प्रत्येक डोमिनियन के लिए एक गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया (ब्रिटिश क्राउन द्वारा, डोमिनियन कैबिनेट की सलाह पर)। * शाही पदवी समाप्त: ब्रिटिश सम्राट की 'भारत का सम्राट' की पदवी समाप्त। * संविधान सभा की भूमिका: दोनों डोमिनियन की संविधान सभाओं को अपने-अपने क्षेत्रों के लिए संविधान बनाने और किसी भी ब्रिटिश कानून को समाप्त करने की शक्ति दी गई। गोल्डन पॉइंट: जब तक नए संविधान लागू नहीं हो जाते, दोनों डोमिनियन 1935 के अधिनियम के तहत शासित होते रहे।

    Topic 28: पृष्ठ 28: संविधान का निर्माण और अंगीकरण

    विभिन्न समितियाँ: संविधान सभा ने 22 प्रमुख समितियों के माध्यम से कार्य किया। * सर्वाधिक महत्वपूर्ण: प्रारूप समिति (Drafting Committee)। * अध्यक्ष: डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (जिन्हें 'भारतीय संविधान का जनक' कहा जाता है)। प्रारूप समिति का कार्य: संविधान का मसौदा तैयार करना। संविधान निर्माण में लगा समय: 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन। अंगीकरण और लागू होना: * 26 नवंबर, 1949: संविधान को अंगीकृत (Adopted), अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया। इस दिन नागरिकता, चुनाव और अस्थायी संसद जैसे कुछ प्रावधान तुरंत लागू हुए। * 26 जनवरी, 1950: शेष और मुख्य भाग लागू हुआ। इस दिन को 'गणतंत्र दिवस' के रूप में मनाया जाता है। महत्व: 26 जनवरी को इसलिए चुना गया क्योंकि 1930 में इसी दिन 'पूर्ण स्वराज' दिवस मनाया गया था।

    Topic 29: पृष्ठ 29: संविधान के प्रमुख स्रोत और उधार ली गई विशेषताएं

    भारतीय संविधान को 'उधार का थैला' (Bag of Borrowings) कहा जाता है क्योंकि इसमें दुनिया के कई सर्वश्रेष्ठ संवैधानिक प्रावधानों को शामिल किया गया है, लेकिन भारतीय संदर्भ में संशोधन के साथ। प्रमुख स्रोत: * भारत सरकार अधिनियम, 1935: संघीय ढांचा, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन प्रावधान। * ब्रिटेन: संसदीय शासन, एकल नागरिकता, कानून बनाने की प्रक्रिया, मंत्रिमंडल प्रणाली। * संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन, राष्ट्रपति पर महाभियोग। * आयरलैंड: राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP), राज्यसभा सदस्यों का नामांकन। * कनाडा: सशक्त केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास। * ऑस्ट्रेलिया: समवर्ती सूची, व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता। गोल्डन पॉइंट: संविधान सभा ने लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया।

    📝 पृष्ठ 30: मास्टर सारांश और त्वरित पुनरीक्षण

    यह पृष्ठ परीक्षा से पहले अंतिम मिनट के पुनरीक्षण के लिए है। महत्वपूर्ण अधिनियम और उनके योगदान: * 1773 (रेगुलेटिंग एक्ट): केंद्रीय प्रशासन की नींव। कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय। * 1784 (पिट्स इंडिया एक्ट): दोहरी सरकार की शुरुआत (BOC/कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स)। * 1833 (चार्टर एक्ट): भारत का गवर्नर जनरल (लॉर्ड विलियम बेंटिक)। केंद्रीयकरण का चरम। * 1858 (GOI एक्ट): कंपनी शासन का अंत। भारत का वायसराय (लॉर्ड कैनिंग)। भारत सचिव पद का सृजन। * 1861 (परिषद अधिनियम): भारतीयों को कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल करना। अध्यादेश की शक्ति। * 1909 (मॉर्ले-मिंटो): सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (मुस्लिमों के लिए)। * 1919 (मोंट-चेम्स): प्रांतों में द्वैध शासन, केंद्र में द्विसदनीयता, प्रत्यक्ष चुनाव। * 1935 (GOI एक्ट): भारतीय संविधान का ब्लूप्रिंट। प्रांतों में स्वायत्तता, केंद्र में द्वैध शासन, संघीय न्यायालय। महत्वपूर्ण तिथियां: * 9 दिसंबर 1946: संविधान सभा की पहली बैठक। * 13 दिसंबर 1946: उद्देश्य संकल्प पेश। * 26 नवंबर 1949: संविधान अंगीकृत। * 26 जनवरी 1950: संविधान लागू।